भृतिहरि ( उज्जैन नरेश ) की समाधि स्थल चुनार दुर्ग | Bhartihari Monument Chunar Fort U.P


चुनार दुर्ग से बाबा भृतिहरि का सम्बन्ध सदियों से जुड़ा हुआ है भगवती भागीरथी गंगा के तट पर बना यह दुर्ग जहा ऐतिहासिक महत्वक है वही तपस्वी तथा सिद्ध-साधक भृतहरि के कारण इसे आध्यात्मिक स्थली होने का भी गौरव प्राप्त है 




सोनवा मंडप का माड़ो | Sonava Mandap Chunar Fort Mirzapur U.P



सोनवा मंडप का यह माड़ो -जहा आल्हा के साथ उसका विवाह हुआ था एक छोटा किंतु चार द्वारों वालो स्थापत्य कला का अच्छा नमूना है ।





बूढ़े महादेव (बाबा बूढ़े नाथ) का मंदिर चुनार दुर्ग मिर्जापुर | Baba Budhe Nath Temple Chunar Mirzapur



स्थापत्य शिल्प की अदभुत कृतिया चुनार दुर्ग के दक्षिण भाग में भैरो गुफा के अंदर स्तिथ है जिसे लोकल लैंग्वेज में बाबा बूढ़े नाथ  का मंदिर भी कहते हैं 

इस गुफा की खोज की कथा भी अपने आप में चकित करने वाली है । जैसे की सर्वविदित है चुनारगढ़ का वर्तमान किला एक विशाल विन्ध्यपर्वत खण्ड पर स्तिथ है बाद में इस पर किला बना उस समय चरण् के आकार के होने के कारण इसे चरणादिगढ़ कहा गया कालांतर में चरणादिगढ़ बिगड़ते बिगड़ते चुनार गढ़ हो गया 



चुनारगढ़ के धरती पर जन्मे विख्यात कवि एवं साहित्यकार कवि पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र '


कवि पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र हिंदी के अप्रितम साहित्यकार एवं पत्रकार थे अपने समय में क्रन्तिकारी कवि होने के कारण स्वतंत्रता संग्राम संग्राम में भी उनका उल्लेखनीय योगदान रहा है अपनी विशिष्ट शैली तथा भाषा के कारण भी उनका बड़ा मान था बीसवीं सदी के दूसरे तीसरे दसक में पाण्डेय बेचन शर्मा उग्र जी का जन्म चुनारगढ़ सददुपुर मोहल्ले में 1900 ई. में 24 दिसम्बर अर्थात विक्रम संवत, 1957 पौष कृष्ण अष्टमी को हुआ था 



रामचन्‍द्र भगवान् अयोध्‍या नगरी में पैदा हुए थे, जो पवित्र तीर्थ मानी जाती है। मैं चुनार में पैदा हुआ, जो काशी के कलेजे और गंगातट पर होकर भी त्रिशंकु की साया में होने से तीर्थ नहीं है। इतना ही नहीं, तीर्थ का पुण्‍य हरण करनेवाला भी है। फिर भी, चुनार मुझे तीर्थ और अयोध्‍या और साकेत से भी अधिक प्रिय है। यह अपनी जन्‍म-भूमि चुनार के बारे में पाण्‍डेय बेचन शर्मा ‘उग्र’ की राय है।