मिर्जापुर और चुनार का ऐतिहासिक कजली की परम्परा | All About Popular lokgeet Kajlee of Mirzapur and chunar


सावन के आगमन के साथ ही नगर के आस पास पेड़ो पर झूले पड़ जाते है और कजली के स्वर गूँजने लगते है ।
कैसे खेले जाई सावन में कजरिया।





चुनार की मूर्ति कला । History Of Chunar Famous Poetry Art


चुनार की मूर्ति कला  : सम्भवतः प्रागैतिहासिक काल से ही हमारे पूर्वज मृदमंद तथा मूर्तियों के निर्माण में रुचि लेने लगे थे मोहनजोदड़ो, हड़प्पा तथा सिंधु घाटी के खुदाई में मिली मिट्टी की बनी वस्तुओ के मिलने से इसकी प्राचीनता प्रकट होती है



हजारो वर्षो तक प्राचीन यह मूर्ति कला आज काफी विकसित हो चुका है अब तो मिट्टी के अतिरिक्त चीनी मिट्टी तथा प्लास्टर आफ पेरिस की बनी कलात्मक चीजे काफी प्रचलित हो गयी है मिट्टी की बनी यह वस्तुए ऐसे तो देश के अनेकों भाग में बनती है किन्तु #चुनार# की बनी यह मुर्तिया भी खूब प्रचलित है बहुत पहले वंश परम्परा से जुड़े लोग ही इस क्षेत्र में थे 

आचार्य कूप और श्री विठ्ठलेश्वर महाप्रभु जी चुनार | Sri Vitheleswar Mahaprabhu & Aacharya Well Chunar Mirzapur


 

मुख्यतः चार वैष्णव सम्प्रदाय माने गए है ये है - रामानुज सम्प्रदाय ,माधव सम्प्रदाय,निम्बार्क सम्प्रदाय,और वल्लभ सम्प्रदाय रामानुज सम्प्रदाय के पर्वतक श्री रामानुजाचार्य थे माध्व सम्प्रदाय के श्री मध्वाचार्य थे निम्बार्क सम्प्रदाय के पर्वतक श्री निम्बुजचार्य थे 

सिद्धपीठ दुर्गाखोह चुनार, मिर्जापुर | Story Of MAA DURGA DEVI Temple Chunar Mirzapur


सिद्धपीठ दुर्गाखोह चुनार

कहते है ऋषि अगस्त्य ने चुनार से ही अपनी दक्षिण भारत की यात्रा आरम्भ की थी जहाँ विन्धयाचल उन्हें साष्टांग प्रणाम मुद्रा में आज तक लेटा हुआ है अगस्त्य से जुड़ने के कारण ही चुनार को दक्षिण भारत का प्रवेश द्वार कहा जाता है आज वर्तमान में चुनार बस स्टेशन से जो मार्ग दुर्गाखोह होते हुए सिद्धनाथ की दरी तक जाता है



जैसे प्रकृतिक ने अपना सम्पूर्ण वैभव यहा विखेर रखा हो चारो ओर सघन वनराजी और झाड़ियों के मध्य बहते झरनों का संगीत सैलानियों मंत्रमुघ्ध कर देता है इस स्थल के प्रवेश द्वार पर दुर्गा खोह है यह स्थान पौराणिक काल से तंत्र साधना का सिद्धपीठ रहा है अनेक तांत्रिक साधनों की यह भूमि सर्वदा से लोगो के कौतूहल का केंद्र रही है कहते है देश के 51 शक्तिपीठो में इसका भी स्थान है और यहा पर भी सती के अंग गिरे थे