Shitla Mata Mandir Adalpura Chunar (शीतला माता मंदिर)

Adalpura शीतला धाँम स्थित प्राचीन शीतला माता मंदिर देश के प्रमुख शक्तिपीठ में से एक है। इस मंदिर के पीछे मान्यता यह है कि यहाँ माँगी गई सभी मुरादें माँ शीतला पूरी करती है। मार्च-अप्रैल में यहाँ लगने वाले चैत मेले में माँ के दर्शन करने के लिए देश के विभिन्न भागों से लोग आते हैं।

MATA Shitla Ji

श्रद्धालुओं की माता शीतला के प्रति इस कदर आस्था है कि वे मंदिर परिसर के बाहर दिन-रात चादर बिछाकर रहते हैं, वहीं खाना बनाते हैं। तेज गर्मी की मार, गंदगी और दूसरी कठनाईयाँ भी आस्था के सामने छोटी पड़ जाती हैं। हालाँकि पूरे नवरात्रि के दौरान यहाँ बहुत श्रद्धालु आते हैं और अष्टमी व नवमी के दिन भक्तों की संख्या कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है।


शीतला माता मंदिर के कार्यकारी अधिकारियों का कहना है कि सबसे ज्यादा भीड़ चैत मेले मे सोमवार और रविवार को होती है। इस दिन ढेड़ से दो लाख लोग यहाँ दर्शन करने आते हैं। इस मौके पर बाहर से आने वाले श्रद्धालुओं को परेशानी न आए इसका प्रशासन की ओर से खास ध्यान रखा जाता है। साल में यहाँ दो बार मेला लगता है। चैत के अलावा सावन माह में भी यहाँ मेले लगते हैं।

Entrance Gate

इस पवित्र स्थान पर लोग अपने बच्चों का मुंडन कराने भी दूर-दूर से आते हैं। जो लोग अपने बच्चों का मुंडन यहाँ आकर नहीं करा पाते वह भी बाद में यहाँ अपने बच्चों को माता के दर्शन कराने के लिए जरूर लेकर आते हैं। इसी तरह अपने बच्चों की शादी की मन्नत भी लोग यहाँ माँगते हैं।

देवी शीतला माता की आराधना करने से पूरे परिवार की एकता बनी रहती हैं। साथ ही माता रानी सभी मुरादें भी पूरी करती हैं। श्रद्धालुओं को माता शीतला के प्रति बड़ी आस्था है।

चुनार का गौरवशाली इतिहास (The glorious history of chunar)

चुनार का गौरवशाली इतिहास


चुनार क्षेत्र मीरजापुर जनपद का एक तहसील चुनार है। काशी (वाराणसी) और विन्ध्य क्षेत्र के बीच स्थित होने के कारण चुनार क्षेत्र भी ऋषियों-मुनियों,महर्षियों, राजर्षियों, संत-महात्माओं, योगियों-सन्यासियों, साहित्यकारों इत्यादि के लिए आकर्षण के योग्य क्षेत्र रहा है। सोनभद्र सम्मिलित मीरजापुर व चुनार क्षेत्र सभी काशी के ही अभिन्न अंग थे।


 चुनार प्राचीन काल से आध्यात्मिक, पर्यटन और व्यापारिक केन्द्र के रूप में स्थापित है। गंगा किनारे स्थित होने से इसका सीधा व्यापारिक सम्बन्ध कोलकाता से था और वनों से उत्पादित वस्तुएँ का व्यापार होता था। चुनार किला और नगर के पश्चिम में गंगा, पूर्व में पहाड़ी जरगो नदी उत्तर में ढाब का मैदान तथा दक्षिण में प्राकृतिक सुन्दरता का विस्तार लिए विन्ध्य पर्वत की श्रृंखलाएँ हैं जिसमें अनेक जल प्रपात, गढ़, गुफा और घाटियाँ हैं। सतयुग में एक विचित्र स्थिति उत्पन्न हो गयी थी, हुआ यह था कि एक प्रतापी, धर्मपरायण, प्रजावत्सल, सेवाभावी, दानवीर, सौम्य, सरल यानी सर्वगुण सम्पन्न राजा बलि हुये। लोग इसके गुण गाने लगे और समाजवादी राज्यवादी होने लगे। राजा बलि का राज्य बहुत अधिक फैल गया। समाजवादियों के समक्ष यानी मानवजाति के समक्ष एक गम्भीर संकट पैदा हो गया कि अगर राज्य की अवधारणा दृढ़ हो गयी तो मनुष्य जाति को सदैव दुःख, दैन्य व दारिद्रय में रहना होगा क्योंकि अपवाद को छोड़कर राजा स्वार्थी होगें, परमुखपेक्षी व पराश्रित होगे। अर्थात अकर्मण्य व यथास्थिति वादी होगे, यह भयंकर स्थिति होगी परन्तु समाजवादी असहाय थे। राजा बलि को मारना संभव न था और उसके रहते समाजवादी विचारधारा का बढ़ना सम्भव न था। ऐसी स्थिति में एक पुरूष कीआत्मा अदृश्य प्राकृतिक चेतना द्वारा निर्मित परिस्थितियों में प्राथमिकता से वर्तमान में कार्य करना, में स्थापित हो गयी। वह राजा बलि से थोड़ी सी भूमि समाज या गणराज्य के लिए माँगा। चूँकि राजा सक्षम और निश्ंिचत था कि थोड़ी भूमि में समाजया गणराज्य स्थापित करने से हमारे राज्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसलिए उस पुरूष को राजा ने थोड़ी भूमि दे दी। जिस पर उसने स्वतन्त्र, सुखी, स्वराज आधारित समाज-गणराज्य स्थापित किया और उसका प्रभाव धीरे-धीरे बढ़ता गया और वह राजा बलि के सुराज्य को भी समाप्त कर दिया और समाज या गणराज्य की स्थापना की गयी। चूँकि यह पुरूष बौना अर्थात् छोटे कद का तथा स्वभावऔर ज्ञान में ब्राह्मण गुणों से युक्त था इसलिए कालान्तर में इसे भगवान विष्णु के पाचवें अवतार वामन अवतार का नाम दिया गया। चूँकि गणराज्य स्थापना का पहला चरण (आदि चरण) का क्षेत्र यह चुनार क्षेत्र ही था इसलिए इसका नाम चरणाद्रि पड़ा जो कालान्तर में चुनार हो गया। पहला चरण जिस भूमि पर पड़ा वह चरण के आकार का है। हमारे प्राचीन भूगोलविज्ञानियों ने अपने सर्वेक्षणों से यह पता लगा लिया कि विन्ध्य की सुरम्य उपत्यका में स्थित यह पर्वत मानव के चरण के आकार का है। विन्ध्य पर्वत श्रंृखला के इस पहाड़ी पर ही हरिद्वार से मैदानी क्षेत्र में बहने वाली गंगा का और विन्ध्य पर्वत की श्रृंखला से पहली बार संगम हुआ है जिस पर चुनार किला स्थित है। अनेक स्थानों पर वर्णन है कि श्रीराम यहीं से गंगा पार करके वनगमन के समय चित्रकूट गये थे। फादर कामिल बुल्के के शोध ग्रन्थ ”राम कथा: उद्भव और विकास“ के अनुसार कवि वाल्मीकि की तपस्थली चुनार ही है इसलिए कहीं-कहीं इसे चाण्डालगढ़ भी कहा गया है। इसे पत्थरों के कारण पत्थरगढ़, नैना योगिनी के तपस्थली के कारणनैनागढ़, भर्तृहरि के कारण इसे भर्तृहरि की नगरी भी कहा जाता है। चुनार क्षेत्र के पत्थर और चीनी मिट्टी की कलाकृतियाँ प्रसिद्ध हैं। राजा-रजवाड़ों के समय चुनार के पत्थरों की काफी माँग थी। 

                 राजाओं द्वारा बनवाये गये किले व घाट इसके प्रमाण हैं। लगभग 3000 वर्ष पूर्व गुप्त साम्राज्य में भी इन पत्थरों का जमकर प्रयोग हुआ। चक्रवर्ती सम्राट अशोक द्वारा निर्मित ”अशोक स्तम्भ“ इसका उदाहरण है जिसका एक भाग सारनाथ (वाराणसी) के संग्रहालय में आज भी रखा हुआ है। काशी (वाराणसी) व मीरजापुर के घाटों व मन्दिरों का निर्माण भी यहीं के पत्थरों से हुआ है। सारनाथ बौद्ध मन्दिर, भारत माता मन्दिर व सम्पूर्णानन्द विष्वविद्यालय भी इसके प्रमाण हैं। भारत का संसद भवन, रामकृष्ण मिशन का बेलूड़ मठ का मन्दिर व लखनऊ में बन रहे अनेक स्मारक चुनार के पत्थरों से ही बने हैं। क्षेत्र में जे.पी. समूह का सीमेण्ट फैक्ट्री भी स्थित है। 

1. चुनार किला -किले में भर्तृहरि की समाधि, समाधि के सम्बन्ध में बाबर का हुक्मनामा, औरंगजेब का हुक्मनामा, सोनवा मण्डप, शेरशाह सूरी का शिलालेख, अनेक अरबी भाषा में लिखे शिलालेख, आलमगीरी मस्जिद, बावन खम्भा व बावड़ी, जहांगीरी कमरा, रनिवास, मुगलकालीन बारादरी, तोपखाना व बन्दी गृह, लाल दरवाजा, वारेन हेस्टिंग का बंगला, बुढ़े महादेव मन्दिर इत्यादि किले के उत्थान-पतन की कहानियाँ कहती हैं।




 2. चुनार नगर – चुनार किले से लगा हुआ ही चुनार नगर है जिसकी भौगोलिक स्थिति बड़ी आकर्षक है। नगर के चारों ओर नदी-नाले, पर्वत-जंगल, झरने, तालाब आदि की बहुतायत है। चुनार नगर उतना ही प्राचीन है जितना चुनार किला। दोनों की स्थापनाव विकास साथ-साथ चलता रहा है। चुनार नगर क्षेत्र के ऐतिहासिक स्थलों में रौजा इफतियार खां, गंगेश्वरनाथ, आचार्य कूप, कदमरसूल, शाह कासिम सुलेमानी का दरगाह, गदाशाह, मुहम्मदशाह, बच्चूशाह, नवलगीर, सूरदास, बालूघाट के भगवान बामन अवतार, भैरो जी,चक्र देवी, आनन्दगिर का मठ, राघो जी के महाबीर, गंगाराम का स्थल, गुरू नानक की संघत, आचार्य कूप और विट्ठल महाप्रभु, सतीवाड़, हजारी की हवेली, गंगा-जरगो संगम, टेकउर के टिकेश्वर महादेव का श्रीचक्र त्रिकोण, अंग्रेजो का कब्रिस्तान इत्यादि के अपने-अपने इतिहास हैं। 


 3. चुनार क्षेत्र – चुनार क्षेत्र के अन्तर्गत जमालपुर, नरायनपुर, सीखड़, राजगढ़ का क्षेत्र और एक नगरपालिका क्षेत्र अहरौरा आता है। सम्पूर्ण चुनार क्षेत्र का ऐतिहासिक, प्राकृतिक, धार्मिक व आध्यात्मिक महत्व अति विशाल और समृद्ध है। इनमें से कुछ ये हैं- जरगो बाँध, बेचूवीर धाम, भण्डारी देवी, लखनियाँ दरी, चूना दरी, गुरूद्वारा बाग सिद्धपीठ दुर्गा खोह,परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्द आश्रम, सिद्धनाथ की दरी, सिद्धनाथ धाम ”धुईं बाबा“, शिवशंकरी धाम, गोपालपुर, सीखड़, माँ शीतला धाम, राम सरोवर इत्यादि।






The Mausoleum of IFTIKHAR KHAN (AD-1605) in Chunar [ समाधि स्थल इफ्तिखार खान ]

The chunar stone mausoleum IFTIKHAR KHAN (Title Name-Dilwar Khan),an officer during the Region of JAHANGIR (AD 1605-27) Was Built in AD-1605 According to an inscription found here.The Tomb is Pentagonal having its entrance through the only Gate from south.The main Dome is Hemispherical surmounted by an inverted lotus surmounted by an inverted lotus capital .





दुर्गा माता मंदिर(चुनार) Durga Maa temple chunar - त्रिकोण यात्रा

चुनार जंक्शन से दक्षिण दिशा की तरफ लगभग 1 किलोमीटर दूर चुनार सक्तेशगढ़ मार्ग पर पहाड़ो में बसा माता का यह मंदिर अपनी प्राकृतिक सौंदर्य झरने तथा त्रिकोण यात्रा हेतु प्रसिद्ध है। मंदिर के आस पास का नजारा मन को अत्यंत शांति प्रदान करने वाला शुद्ध वातावरणयुक्त है ।

                      
माता का यह मंदिर धार्मिक मान्यताओ के अनुसार अपनी त्रिकोण यात्रा के लिए प्रसिद्ध है। जैसे विंध्याचल माता के दर्शन को त्रिकोण यात्रा के बाद ही पूर्ण माना जाता है ठीक उसी तरह यहाँ की मान्यता है। दुर्गा माता मंदिर के बगल में त्रिकोण यात्रा के दूसरे चरण में काली माता का मंदिर तथा तत्पश्चात तीसरे चरण में भैरव जी का मंदिर काली माता मंदिर के सामने उपस्थित है। आसपास के जिलो से प्रतिवर्ष हज़ारो की संख्या में श्रद्धालु यहाँ दर्शन करने के साथ साथ अपनी छुट्टियां मनाते है। आसपास की ग्रामीण जनसंख्या वैवाहिक कार्यक्रमो के लिए भी यहाँ उपस्थित होती है। अनेक भक्तगण यहाँ अपनी मन्नत तथा मान्यताओ को भी पूर्ण करने के लिए भी आते है। बहुत से लोग अपने बच्चों के मुंडन कार्यक्रम को भी यहाँ आयोजित करते है।

ऐसी मान्यता है की जो लोग माता विंध्याचल में अपनी त्रिकोण यात्रा पूरी नही कर पाते है वो यही दर्शन कर के अपनी यात्रा को पूर्ण कर सकते है। उन्हें उसी त्रिकोण यात्रा का फल प्राप्त होता है। वर्षा के मौषम में अथवा सावन माह में लगने वाले मेले के समय यहाँ घूमना उचित समय है।तब आप यहाँ के झरनो को लुफ्त अत्यंत प्रफुल्लित मन के साथ उठा सकते है।


यहाँ पर आपको उपस्थित कुण्ड में सदैव जल उपस्थिर मिलेगा जहाँ पर श्रद्धालु तथा मंदिर के लोग स्नान करते है। बरसात के दिनों में इन कुंडो में स्नान करने का यहाँ अपना ही अंदाज है।आसपास के क्षेत्रो से बहुत अधिक संख्या में लोग यहाँ कुण्ड में स्नान का आनंद लेने हेतु यहाँ जरूर आते है।



दुर्गा खोह:-  
जब आप मंदिर के अंदर प्रवेश करेंगे तो आपको एक अत्यंत छोटा गुफा की तरह स्थान सीढ़ियों को पास मिलेगा ।यह वही स्थान है जहाँ माता प्रकट हुई थी।

दुर्गा माता मंदिर के बाहर आपको महादेव जी ,हनुमान जी,गणेश भगवान् तथा भैरव जी का भी मंदिर मिलेगा जहाँ पर दर्शन को अत्यंत पुण्य माना जाता है।
काली खोह:-
त्रिकोण यात्रा के अगले भाग में हम यहाँ काली माता के दर्शन करते है। काली माता के दर्शन हेतु जाने का मार्ग अत्यंत सुन्दर तथा प्राकृतिक हरियाली को यहाँ पिरोये हुए है।



माता काली के मंदिर के पास एक कूप है जिसमे सदैव जल रहता है।आस पास की ऐसी मान्यता है की लगातार इस कूप का जल पिने से उदर रोग में अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है।

वटुक भैरों नाथ जी:- 
 त्रिकोण यात्रा के अगले चरण में यहाँ हम श्री वटुक भैरो नाथ जी के दर्शन करते है। यहाँ उपस्थित एक अन्य कुण्ड तथा पीछे उपस्थित पहाड़ो से आता हुआ जल और उसकी ध्वनि लोगो के मन को अपनी तरफ आकर्षित करती है।

बकरिया कुण्ड:-
यदि चुनार जंक्शन की तरफ से माता दुर्गा मंदिर के दर्शन के लिए जाते वक़्त मंदिर से आधा किलोमीटर पहले यह स्थित है।यह कुण्ड सामान्यतः पहाड़ो से गिरने वाले जल से भरा रहता है लेकिन यदि आप बारिश के मौषम में यहाँ आते है तो आप जलमग्न कुण्ड का आनंद ले पाएंगे।


कुछ विशेष बातें :- 

 (1)  यहाँ से सिद्धनाथ दरी लगभग 19 किलोमीटर दूर स्थित है । जहाँ आप अत्यंत सुदर जलप्रपात का आनद ले सकते है।
(2) मंदिर परिसर से लगभग 16 किलोमीटर की दुरी पे बाबा अड़गड़ानंद जी का भी आश्रम है ।

(3) ऐसी मान्यता है है की देवकीनन्दन खत्री जी जब यहाँ से एक किलो मीटर की दुरी पर स्थित एक पीपल के निचे अपने उपन्यास चंद्रकांता को लिख रहे थे तब उनकी मुलाक़ात गुरु दत्रात्रेय जी से हुई थी।


ध्यान देने योग्य :- 

यह मंदिर हमेशा से अनेक प्रकार की उपेक्षाओं का शिकार हुआ है ।यहाँ आस पास प्रशासन द्वारा करोड़ो के पेड पौधे लगाये गए लेकिन वनस्पति माफियाओ तथा लोकल लोगो द्वारा यह वन कटान का शिकार हो रहा है। प्रति वर्ष आने वाले श्रद्धालुओं की अपेक्षा यहाँ कूड़ा फेकने का कोई विशेष प्रबंध नही है जिसकी वजह से यहाँ गन्दगी बहुत बढ़ती जा रही है।

हमारे इस पोस्ट का एक मात्र उद्देश्य यहाँ पर पर्यटन को बढ़ावा देने के साथ साथ इसकी सफाई और व्यवस्था पर आपका ध्यान केंद्रित करना है।
Content source:-

(1) इंटरनेट-upeasttourism,varansitourism,wikipidea,youtube videos
(2) स्वयं का अनुभव
(3) photograph:-Facebook chunar page and chunar club on facebook